आज के चुनिंदा शेर

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कर रहा था गम-ये-जहा का हिसाब आज तुम-याद-बेहिसाब आये

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पानी में अक्स और किसी आसम का है ये नौव कौन सी है ये दरिया कहा का है

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देखा है जिंदिगी को कुछ इतने करीब से चहरे तमाम लगने लगे है अजीब से

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नहीं दुनिया को जब परवाह हमारी तो फिर दुनिया की परवाह क्यों करे

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जूनून जिसकी थी उसको तो न पाया हमने इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने

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